( तनहाइयाँ )
खुद से भागते रहे यूँ दर बदर
फिर भी पीछा करती रहीं परछाईयां
तन्हाई में तो मुस्कुराते रहे थे हम
मगर महफ़िल में रोती रही तनहाइयाँ
जिनसे थी वफ़ा की उम्मीद हमें
क्यों मिलती रही उनसे बेवफाईयां
बहुत रुसवा हुए है इस जहाँ में आरज़ू
अब जीने नहीं देती ये रुसवाईयां
( आरज़ू)
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