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अंजान सा हूँ मैं

         अंजान सा हूँ मैं

वो कौन सी बात है दिल में
जो छुपी सी है जो रुकी सी है
जो ख़ामोश सी है,
जिससे अंजान सा हूँ मै।
क्यों ये लब मज़बूर से जड़ है
जो थरथराते भी नहीं
इन सांसों पे कौन सा क़र्ज़ है
जो सरसराते भी नहीं
बस बेरुखी से चुपचाप से
चलती हैं गुज़रती हैं।
कोई तो है जो देखता है
मेरी इन आँखों से
पर छुपा सा रहता है उनमें कहीं।
कोई तो है जिसने  रोक रखा है
आबोशार को
जो रूठा सा रहता है उनमें कहीं।
खुदी में अकेला सा रहता हूँ
खुदी को सहता रहता हूँ
मैं चीख़ना चाहता हूँ
चिल्लाना चाहता हूँ
जी भरके रोना चाहता हूँ
मुस्कुराना चाहता हूँ
पर अपनी ही रूह से
बिछड़ गया हूँ शायद
जिसके बिना कितना
बेजान सा हूँ मैं।
वो कौन सी बात है दिल में 
जिससे, अंजान सा हूँ मै।

आरज़ू-ए-अर्जुन

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