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Mai uljhi zindgi suljha raha hun. Ghazal

आदाब

अभी यह वक्त को बतला रहा हूँ
मैं उल्झी ज़िंदगी  सुलझा  रहा हूँ

मेरी  राहें  नहीं  आसान   हैं  अब
यहाँ हर ख़ार को अपना  रहा  हूँ

कभी आंधी कभी तूफां को झेला
मगर  आगे  मैं  बढ़ता  जा रहा हूँ

जहाँ पर गिर रही थी बिजलियाँ भी
वहीं  पे आशियां  बुनता  रहा  हूँ

यहाँ जो तलखियां  देते थे मुझको
उन्हीं  को  आईना  करता  रहा हूँ

चलाया  तीर  जिसने  दिल पे मेरे
उसी   के   वास्ते  मरता   रहा  हूँ

यकीं  कैसे  करूँ यारों  पे अब मैं
यहाँ  धोखे  बहुत  खाता  रहा हूँ

यहाँ पर धूप में  रोटी की  ख़ातिर
सुबह से शाम  जलता जा रहा हूँ

मुझे कुंदन अभी  तुम कह रहे हो
मैं  बरसों आग  में  तपता रहा हूँ

नहीं मैं सीख पाया दिल का सौदा
तभी  तो 'आरज़ू ' छलता रहा  हूँ

आरज़ू -ए-अर्जुन

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