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आहिस्ता आहिस्ता

           आहिस्ता आहिस्ता

यह हवा में जो  खुशबु रिस रही है तुम्हारी
मदहोश हो रहा है जहां आहिस्ता आहिस्ता


ये कानों में क्या कह दिया तुमने फिज़ा के
महकने लगी हैं बहारें आहिस्ता आहिस्ता

क्यों उड़ने देते हो जुल्फो को शोख़ हवाओं में
लो उड़ने लगी है घटा भी आहिस्ता आहिस्ता

न कीजिये बातें फूल कलीयों से यूँ हसकर
रंज रखने लगे हैं भवरे आहिस्ता आहिस्ता

मत निकला करो चांदनी रातों में बनसंवर के
छिपने लगता है चाँद भी आहिस्ता आहिस्ता

जो नज़र भर के देख लेते हो जब तुम मुझे
दीवानें हो जाते हैं हम आहिस्ता आहिस्ता

यूँ शर्मा कर न सिमटा करो खुदी में सनम
जान जाने लगती है हमारी आहिस्ता आहिस्ता

आरज़ू तो लुट चुका है सनम तेरे हुस्न से
अब लुट रहे हैं फरिश्ते आहिस्ता आहिस्ता

आरज़ू- ए -अर्जुन 

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