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कैसे कहे शज़र कोई पत्थर न आएगा

आदाब

रूठा है इस कदर  के  वो रहबर न आएगा
अब थामने को हाथ  वो दिलबर न आएगा

हम  लांघ  आयें  हैं  कई  उम्रों  के  फासले
बचपन  का  बेशकीमती  मंज़र  न आएगा

लिखना पड़ेगा  आपको  इतिहास आप ही
किस्मत  सवारने  को   मुकद्दर  न  आएगा

जिस पेड़ पर लदी सी हों फलदार डालियाँ
कैसे  कहे   शज़र  कोई  पत्थर  न आएगा

नादान हो  बशर के  फ़क़त  सोचते हो तुम
मंज़िल  के  रास्ते  में   समंदर   न  आएगा

करता है  माफ़ आपको  खून-ए-जिगर मेरा
कहता है  नाम आपका  लब पर न आएगा

माना के हमसफ़र  है वो, पर  है तो आदमी
वो जान पर तो  खेल के अक्सर न आएगा

दुनिया को जीतना है तो  कर प्यार 'आरज़ू'
सच ये बताने आप को  सिकंदर न आएगा

आरज़ू -ए-अर्जुन

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