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Faasle ab mit rahein hai....

आदाब

हो  रही  है  गुफ़्तगू  अब  दो  दिलों  के दरम्याँ
फासले  अब  मिट  रहे  हैं  चाहतों  के  दरम्याँ

अब  बयां  कैसे  करें   तेरे  जमाल-ए-हुस्न  को
हर्फ़   सारे   लड़. पड़े   हैं  शायरों   के  दरम्याँ

दो  कदम  के  फासले पे  हैं  खड़े  मुख फेर के
कितनी ख़ामोशी सी है  इन सरहदों  के दरम्याँ

पर्बतों से यूं बिछड़  के मुख्तलिफ़ करती सफ़र
मिल ही  जाती हर नदी  फिर सागरों के दरम्याँ

चाहते  हो  ग़र  जलाना आँधियों  में  ये चिराग
आने दो  अड़चन न  कोई  हौसलों  के  दरम्याँ

कोई  भी मझधार कश्ती  को डुबो सकती नहीं
हौसले  के  साथ  डट  जा  साहिलों  के दरम्याँ

तब  समझना यार तुमको  कामयाबी  है  मिली
नाम  आये  जब  अदब  से  दुश्मनों  के दरम्याँ

चाहता है 'आरज़ू' भी आसमां  तक घर हो इक
पर उखड़ जाए न जड़ से ख्वाहिशों  के दरम्याँ.

आरज़ू-ए-अर्जुन

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